नेपाल की राजनीति पिछले तीन दशकों से लगातार उतार-चढ़ाव और अस्थिरता से गुजर रही है। राजशाही से लोकतंत्र की ओर बढ़ते कदम के बावजूद जनता बार-बार राजनीतिक संकट और सत्ता बदलाव की मार झेलती रही है।
1951 में राणा शासन के अंत के बाद राजा त्रिभुवन ने लोकतंत्र की दिशा में पहला कदम बढ़ाया। हालांकि, 1961 में राजा महेन्द्र ने पंचायती व्यवस्था लागू कर दी, जिससे राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लग गया। यह व्यवस्था लगभग तीन दशक तक जारी रही। 1990 में ‘जनआंदोलन I’ के माध्यम से जनता ने लोकतंत्र की बहाली की मांग की और बहुदलीय लोकतंत्र की राह खोली।
1996 में माओवादी पार्टी ने सशस्त्र संघर्ष शुरू किया। इस गृहयुद्ध में हजारों लोग मारे गए और देश में अस्थिरता फैल गई। 2006 में ‘जनआंदोलन II’ के परिणामस्वरूप राजा ज्ञानेन्द्र को सत्ता छोड़नी पड़ी और नेपाल 2008 में संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया।
नया संविधान और अस्थिर लोकतंत्र
2015 में नेपाल ने नया संविधान अपनाया, जिसमें संघीयता, धर्मनिरपेक्षता और बहुदलीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गई। लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक अस्थिरता कम नहीं हुई और कई सरकारें समय से पहले गिर गईं।
सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध में बड़े प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में कई सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचा और 19 लोगों की जान गई। इसके बाद ओली ने इस्तीफा दे दिया। वहीं कुछ समूहों ने पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह की वापसी की भी मांग उठाई, जिससे राजनीतिक बहस और गर्म हो गई।
नेपाल की राजनीतिक यात्रा संघर्ष, परिवर्तन और निराशा की कहानी है। राजशाही से लोकतंत्र और फिर लोकतंत्र से निराशा की ओर यह सफर दर्शाता है कि राजनीतिक स्थिरता और मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं ही देश को स्थायी रूप से आगे बढ़ा सकती हैं।



