भोपाल — मध्य प्रदेश की सियासत में कई दशकों से सक्रिय, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सोमवार को एक ऐसा बयान दिया जिसने न सिर्फ खबरों में जगह बनाई, बल्कि एक बार फिर धर्म, आस्था और राजनीति को लेकर चल रही बहस को हवा दे दी।
भोपाल में आयोजित आदिवासी कांग्रेस के महासम्मेलन में बोलते हुए दिग्विजय सिंह ने साफ कहा कि,
“अगर धर्मांतरण आस्था से किया जाए, तो वह अपराध नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन अगर किसी को डराकर, लालच देकर या दबाव बनाकर धर्म बदला जाता है, तो वह गलत है और कानूनन अपराध भी है।”
उनकी यह बात सुनने में भले ही सीधी-सादी लगे, लेकिन इसके पीछे कई परतें हैं — कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक भी।
धर्मांतरण: जब आस्था बन जाती है सवाल
आज के भारत में धर्मांतरण एक संवेदनशील मुद्दा है। खासकर आदिवासी इलाकों में यह बहस और भी तेज है। बहुत से लोग मानते हैं कि ईसाई मिशनरियों या अन्य संगठनों द्वारा गरीब और अशिक्षित लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया जाता है। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हर धर्म परिवर्तन लालच या ज़बरदस्ती से नहीं होता — कई बार यह किसी की गहरी आस्था और आत्मिक अनुभव का नतीजा होता है।
दिग्विजय सिंह ने इसी पहलू को सामने रखा। उनका कहना था कि संविधान हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वो चाहे तो किसी भी धर्म को अपनाए, बशर्ते वह निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया गया हो।
आदिवासी समाज की अलग पहचान
अपने भाषण में दिग्विजय सिंह ने आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक विशिष्टताओं पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा,
“आदिवासी न तो हिंदू हैं, न ईसाई और न मुसलमान। वे प्रकृति के उपासक हैं। उनकी अपनी आस्था है, जो हजारों सालों से चली आ रही है।”
उन्होंने ‘सरना धर्म’ को जनगणना में अलग पहचान देने की मांग का समर्थन किया, ताकि आदिवासी समाज अपनी धार्मिक पहचान को खोए बिना अपने तरीके से जीवन जी सके।
राजनीति की ज़मीन पर धर्म की बहस
दिग्विजय सिंह का बयान सिर्फ सामाजिक मुद्दों तक सीमित नहीं था। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर भी निशाना साधा और कहा कि धर्मांतरण का मुद्दा जब-तब राजनीतिक फायदे के लिए उठाया जाता है।
“बीजेपी को जब भी चुनाव आते हैं, या जब उन्हें असल मुद्दों पर जवाब देना मुश्किल होता है, तब वो धर्मांतरण की बात करने लगते हैं।”
उनका इशारा था कि रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आदिवासी अधिकार जैसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह रणनीति अपनाई जाती है।
कानून क्या कहता है?
मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं। इन कानूनों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बल, धोखे, लालच या जबरदस्ती से किसी को धर्म बदलने के लिए मजबूर करता है, तो यह अपराध माना जाता है।
लेकिन इन कानूनों की
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
बीजेपी ने दिग्विजय सिंह के बयान को “तुष्टिकरण की राजनीति” करार दिया, जबकि कांग्रेस और सामाजिक संगठनों ने उनके बयान का समर्थन करते हुए इसे संवैधानिक अधिकारों की रक्षा बताया।दिग्विजय सिंह का यह बयान केवल एक राजनेता का मत नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल भी है — क्या हम एक ऐसा समाज बना पाए हैं, जहां हर व्यक्ति को आस्था की स्वतंत्रता मिले?
इस बयान ने एक बार फिर से धर्म, संविधान और राजनीति के बीच की जटिलताओं को सामने ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस किस दिशा में जाती है।



