पेट्रोल-डीजल और शराब-बीयर GST के दायरे में क्यों नहीं? जानिए इसके पीछे के आर्थिक और राजनीतिक कारण

नई दिल्ली – देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) को लागू हुए 8 साल से अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन आज भी पेट्रोल, डीजल, शराब और बीयर जैसी चीजें इसके दायरे में नहीं आती हैं। आम जनता के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब बाकी सभी चीज़ों पर एक समान टैक्स लगाया जा सकता है, तो इन ज़रूरी और आम उपयोग की वस्तुओं को GST से बाहर क्यों रखा गया है?

आइए, इस सवाल का जवाब आर्थिक, संवैधानिक, और राजनीतिक दृष्टिकोण से समझते हैं।

1. राज्यों की सबसे बड़ी आय का स्रोत

सबसे पहली और अहम वजह यह है कि पेट्रोल, डीजल और शराब पर लगने वाले टैक्स से राज्य सरकारों को भारी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है।

पेट्रोल और डीजल पर राज्य सरकारें वैट (VAT) लगाती हैं, जबकि शराब पर एक्साइज ड्यूटी। अगर इन चीजों को GST के अंतर्गत लाया जाए, तो राज्य सरकारों को मिलने वाला यह सीधा राजस्व बहुत हद तक कम हो जाएगा, क्योंकि GST के तहत टैक्स केंद्र और राज्य के बीच 50-50 बंटता है।

2. संविधान में राज्यों का अधिकार

भारतीय संविधान के सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) के अनुसार, कुछ विषय पूरी तरह से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जिन्हें “राज्य सूची” कहा जाता है।

शराब और पेट्रोलियम पदार्थ ऐसे ही विषय हैं जिन पर राज्य सरकारें स्वतंत्र रूप से कर लगा सकती हैं। इस कारण केंद्र सरकार इन पर GST थोप नहीं सकती, जब तक कि GST काउंसिल में सभी राज्यों की सहमति न मिल जाए।

3. राजनीतिक संवेदनशीलता और क्षेत्रीय स्वायत्तता

शराब और ईंधन के दाम केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दे भी हैं। कई राज्यों में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध है, जबकि कुछ राज्यों में यह सबसे बड़ी कमाई का जरिया है।

इसी तरह, ईंधन के दाम सीधे तौर पर जनता की क्रय शक्ति और सरकार की लोकप्रियता पर असर डालते हैं।

अगर ये चीजें GST में आ जाएँ, तो राज्य सरकारों की नीति निर्धारण की आज़ादी पर असर पड़ेगा, जो भारत जैसे संघीय ढांचे (Federal Structure) वाले देश में एक संवेदनशील मुद्दा है।

4. GST दरें हैं कम, जबकि वर्तमान टैक्स अधिक

वर्तमान में GST की सबसे ऊँची दर 28% है, जबकि पेट्रोल और डीजल पर कुल टैक्स (केंद्र + राज्य मिलाकर) कई बार 100% से भी अधिक होता है।

अगर इन पर केवल 28% GST लगाया जाए, तो सरकारों को मिलने वाला राजस्व आधे से भी कम रह जाएगा।

इसे संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त सेस लगाने की बात भी की गई थी, लेकिन यह प्रक्रिया जटिल और राज्यों के हितों के खिलाफ मानी जाती है।

5. इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की समस्या

अगर ईंधन और शराब को GST के अंतर्गत लाया जाता है, तो इनके ऊपर जो टैक्स लगेगा, वह इनपुट टैक्स क्रेडिट के रूप में व्यवसायों द्वारा क्लेम किया जा सकता है। इससे सरकारों की नेट टैक्स कलेक्शन और भी कम हो सकती है।

उद्योग जगत की ओर से बार-बार यह मांग की गई है कि पेट्रोल-डीजल पर ITC की सुविधा दी जाए, ताकि माल ढुलाई की लागत कम हो, लेकिन इसे लागू करना राजस्व नुकसान की वजह से संभव नहीं हो पाया।

6. GST काउंसिल की सहमति अनिवार्य

GST काउंसिल, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, ही यह तय करती है कि कौन-कौन से उत्पाद GST के तहत आएंगे। अब तक की सभी बैठकों में यह तय किया गया है कि पेट्रोलियम और शराब को GST में शामिल करना अभी संभव नहीं है

यह भी गौरतलब है कि हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि ईंधन पर GST क्यों नहीं लगाया जा रहा है, लेकिन केंद्र का जवाब था कि इसके लिए सभी राज्यों की सर्वसम्मति आवश्यक है।

जब तक राज्य सरकारों को यह भरोसा नहीं होगा कि GST के तहत उन्हें पर्याप्त राजस्व क्षतिपूर्ति (Compensation) मिलेगी, तब तक पेट्रोल, डीजल और शराब को GST में लाना मुश्किल है।

हालांकि केंद्र सरकार ने कहा है कि भविष्य में इस पर विचार हो सकता है, लेकिन यह तभी मुमकिन होगा जब राजनीतिक सहमति, आर्थिक स्थिरता और संवैधानिक प्रक्रिया सभी एक साथ मेल खाएं।

जनता की उम्मीदें बनी हुई हैं

आम नागरिकों को उम्मीद है कि अगर इन उत्पादों को GST में शामिल किया जाए, तो कीमतों में पारदर्शिता आएगी और दरों में एकरूपता होगी। लेकिन फिलहाल सरकारों के लिए यह एक राजस्व का चट्टान है, जिसे गिराना आसान नहीं।

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