DELHI-NCR: दिवाली और ग्रीन पटाखों पर कोर्ट का ‘शर्तों भरा’ फ़ैसला

DELHI-NCR

DELHI-NCR: हर साल दिवाली आती है, और उसके साथ आती है सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की उत्सुकता। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। बुधवार को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के निवासियों को दिवाली मनाने के लिए एक ‘शर्तों भरी’ छूट दी है। इस फ़ैसले के तहत, आप ग्रीन पटाखों की बिक्री कर सकते हैं और उन्हें फोड़ भी सकते हैं, लेकिन इस खुशी पर समय की एक लगाम लगा दी गई है।
​कोर्ट ने साफ़ कहा है कि दिवाली से एक दिन पहले और दिवाली के त्यौहार के दिन, पटाखों का शोर सिर्फ़ तीन घंटे तक ही गूँज सकता है।
पहला दौर: सुबह 6 बजे से 7 बजे तक।
दूसरा दौर: रात 8 बजे से 10 बजे तक।
​यह फ़ैसला दिखाता है कि न्यायपालिका, हमारी परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कितनी जद्दोजहद करती है।

प्रदूषण की कहानी: जहाँ से यह सब शुरू हुआ

आज से लगभग एक दशक पहले, यानी 2014-15 के आसपास, देश की राजधानी में हवा इतनी ज़हरीली होने लगी कि साँस लेना भी दूभर हो गया। दिवाली के बाद के दृश्य किसी धुंधले युद्ध क्षेत्र से कम नहीं होते थे। प्रदूषण के बढ़ते इस विकराल रूप को देखते हुए ही, सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले इस क्षेत्र में पारंपरिक पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था।
​यह प्रतिबंध रातों-रात नहीं लगा था, बल्कि यह हर साल सर्दियों में दिल्ली को घेरने वाली जानलेवा स्मॉग (धुंध) और एक्यूआई (Air Quality Index) के ख़तरनाक स्तर पर पहुँचने का सीधा परिणाम था। कोर्ट का मक़सद स्पष्ट था: लोगों को ज़हरीली हवा से बचाना, जो श्वसन संबंधी बीमारियों और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ बन रही थी।

ग्रीन पटाखे: समाधान या छलावा?

​प्रतिबंध लगने के बाद लोगों ने सवाल किया, “तो क्या अब हम दिवाली मनाना छोड़ दें?” इसी सवाल के जवाब में वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ एक नए विकल्प के साथ आए, जिसे ग्रीन क्रैकर्स कहा गया।

ग्रीन पटाखों का जन्म:

इन पटाखों को भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (CSIR-NEERI) ने 2018 में विकसित किया था। यह पहल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के साथ मिलकर की गई थी। विचार यह था कि एक ऐसा पटाखा बनाया जाए जो मज़ा भी दे, पर पर्यावरण को कम से कम नुक़सान पहुँचाए। CPCB के पूर्व अधिकारियों ने बताया था कि विशेष रूप से उत्तर भारत की सर्दियों और त्यौहारों के दौरान होने वाले गंभीर प्रदूषण से लड़ने के लिए इसकी सख़्त ज़रूरत थी।

ये अलग कैसे हैं?

​पारंपरिक पटाखों में बैरियम नाइट्रेट और एल्युमिनियम जैसे कई ख़तरनाक रसायन होते हैं, जो हवा में मिलने पर ज़हरीले कण (Toxic Particles) पैदा करते हैं। ग्रीन पटाखे इन हानिकारक रसायनों के उपयोग से बचते हैं और इन्हें कम विषैले कच्चे माल से बनाया जाता है। दावा यह है कि ये पुराने पटाखों के मुक़ाबले लगभग 30\% कम हानिकारक गैसों का उत्सर्जन करते हैं और ध्वनि प्रदूषण को भी नियंत्रित करते हैं। ‘ग्रीन’ का मतलब ‘पूरी तरह सुरक्षित’ नहीं|
​हालांकि, हमें एक बात पर ध्यान देना होगा: ग्रीन पटाखे एक बेहतर विकल्प ज़रूर हैं, लेकिन विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि ये पूरी तरह से हानिरहित (Totally Harmless) नहीं हैं।उदाहरण के लिए, अगर पारंपरिक पटाखा ज़ोरदार खाँसी है, तो ग्रीन पटाखा हल्की-सी खरखराहट। दोनों ही फेफड़ों के लिए आदर्श नहीं हैं, पर एक दूसरे से काफ़ी बेहतर है।

​इस फ़ैसले के बाद अब गेंद जनता के पाले में है। एक तरफ़ वर्षों पुरानी परंपरा है, और दूसरी तरफ़ हमारा और हमारी अगली पीढ़ी का स्वास्थ्य। सुप्रीम कोर्ट ने हमें एक रास्ता दिखाया है, अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इन शर्तों का पालन करके अपनी दिवाली को ‘हरित’ (Green) और ‘स्वस्थ’ बनाते हैं या फिर चंद मिनटों के शोर के लिए प्रदूषण की चादर फिर से ओढ़ लेते हैं। त्यौहार का असली मज़ा तब है जब वह सबकी सेहत और सलामती के साथ मनाया जाए

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