नई दिल्ली/वॉशिंगटन। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय संघ और G7 देशों से अपील की है कि वे भारत और चीन से आने वाले सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने पर विचार करें। ट्रंप का कहना है कि दोनों देश रूस से सस्ता तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रहे हैं।
ट्रंप की रणनीति: रूस पर कड़ा दबाव
ट्रंप का मानना है कि मौजूदा आर्थिक प्रतिबंध रूस पर ज्यादा असर नहीं डाल पा रहे हैं। रूस तेल की बिक्री से अब भी भारी राजस्व कमा रहा है। अगर भारत और चीन पर 100% टैरिफ लगाया गया तो वे रूस से तेल खरीदने में संकोच करेंगे और रूस की कमाई पर चोट पहुंचेगी।
G7 देशों पर दबाव क्यों?
अमेरिका चाहता है कि यह कदम अकेले न उठाया जाए। अगर जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान और कनाडा जैसे G7 देश भी इसमें शामिल हो जाएं तो असर कई गुना बढ़ेगा। सामूहिक कदम से भारत और चीन पर आर्थिक दबाव डाला जा सकेगा।
भारत का जवाब
भारत ने साफ कहा है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा सबसे अहम है। भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और उसे सस्ते ऊर्जा स्रोतों की जरूरत है। भारत का तर्क है कि यह उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का हिस्सा है और वह किसी दबाव में आकर नीति नहीं बदलेगा।
चीन ने भी अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि वह अपनी ऊर्जा नीति अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही तय करेगा। पहले से ही अमेरिका-चीन संबंध तनावपूर्ण हैं और नए टैरिफ से यह और बिगड़ सकते हैं।
संभावित चुनौतियाँ और असर
- कानूनी बाधाएँ: EU में टैरिफ बढ़ाने के लिए लंबी प्रक्रिया और सभी देशों की सहमति जरूरी है।
- जवाबी कार्रवाई: भारत और चीन भी जवाब में शुल्क बढ़ा सकते हैं।
- सप्लाई चेन पर असर: उपभोक्ताओं तक महंगाई पहुंचेगी और उत्पाद महंगे होंगे।
- राजनीतिक तनाव: भारत-अमेरिका रिश्तों में खटास आ सकती है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर असर
अगर टैरिफ लागू हुआ तो टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वैलरी, लेदर और फार्मा जैसे सेक्टर प्रभावित होंगे। इन उद्योगों पर लाखों नौकरियों का बोझ है और अमेरिकी-यूरोपीय बाजारों में उनकी प्रतिस्पर्धा घट सकती है।
फिलहाल G7 देशों में इस पर चर्चा चल रही है। कई देशों को डर है कि इतना सख्त कदम हालात बिगाड़ सकता है। भारत ने दोहराया है कि उसकी प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा है और वह किसी दबाव में नहीं झुकेगा।
ट्रंप का प्रस्ताव बताता है कि अमेरिका रूस पर दबाव बनाने के लिए कितना आक्रामक हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत और चीन जैसे दिग्गज देश इतनी आसानी से झुकेंगे? आने वाले महीनों में यही मुद्दा वैश्विक राजनीति और व्यापार का सबसे बड़ा परीक्षण बन सकता है।



