नेपाल में खत्म हुआ संवैधानिक संकट: सुशीला कार्की बनीं पहली महिला प्रधानमंत्री, भारत ने जताई उम्मीदें

काठमांडू/नई दिल्ली। आखिरकार नेपाल में जारी राजनीतिक उठापटक और तनाव पर विराम लग गया है। लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों और संवैधानिक संकट के बीच राष्ट्रपति ने बड़ा फैसला लिया और पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। इसके साथ ही नेपाल ने इतिहास रच दिया है, क्योंकि कार्की देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी हैं।

क्यों आया संकट?

पिछले कुछ महीनों से नेपाल की सड़कों पर युवाओं का गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। ‘Gen Z आंदोलन’ के नाम से शुरू हुआ यह विरोध सिर्फ सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था से निराशा का प्रतीक बन गया। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और रोजमर्रा की समस्याओं ने लोगों को इतना परेशान किया कि सरकार का टिक पाना मुश्किल हो गया।

जब हालात काबू से बाहर होने लगे तो राष्ट्रपति को हस्तक्षेप करना पड़ा। संसद भंग कर दी गई और अब मार्च 2026 में नए चुनाव होंगे। तब तक सुशीला कार्की देश की बागडोर संभालेंगी।

कौन हैं सुशीला कार्की?

अगर नेपाल की राजनीति को देखें तो कार्की का नाम थोड़ा अलग है। वे कोई करियर पॉलिटिशियन नहीं हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस रह चुकी हैं। 2016–17 के दौरान उन्होंने न्यायपालिका की कमान संभाली और कई सख्त व ऐतिहासिक फैसले दिए।

लोग उन्हें ईमानदार, सख्त और निष्पक्ष छवि वाली महिला के रूप में जानते हैं। शायद यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल भी इस कठिन घड़ी में उनके नाम पर सहमत हो गए।

भारत की नज़र नेपाल पर

भारत और नेपाल के रिश्ते हमेशा से खास रहे हैं। दोनों देशों के बीच गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। यही कारण है कि भारत ने भी इस घटनाक्रम का स्वागत किया। भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि नेपाल में शांति और स्थिरता पूरे क्षेत्र के लिए जरूरी है।

भारत की चिंता भी वाजिब है—अगर नेपाल में अस्थिरता बनी रहती, तो इसका असर सीधे भारत के सीमावर्ती इलाकों पर भी पड़ता।

सुशीला कार्की के सामने राह आसान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल संविधान को लेकर है, क्योंकि नेपाल के कानून के मुताबिक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को राजनीतिक पद पर बैठने की अनुमति नहीं है। हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए राष्ट्रपति ने यह कदम उठाया, लेकिन आने वाले समय में इस पर कानूनी बहस हो सकती है।

इसके अलावा, आर्थिक मोर्चा भी बड़ी चुनौती है। पर्यटन क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है, महंगाई बढ़ रही है और बेरोजगारी युवाओं के गुस्से की असली वजह है। कार्की को चुनाव तक इन मोर्चों पर स्थिरता बनाए रखनी होगी।

जनता की उम्मीदें

सड़क पर निकलकर देखें तो लोगों की उम्मीदें और सवाल दोनों सामने आते हैं। कई लोग खुश हैं कि नेपाल को आखिरकार पहली महिला प्रधानमंत्री मिली है। उनका मानना है कि कार्की ईमानदार हैं और चुनाव तक माहौल शांत रख पाएंगी।

लेकिन एक बड़ा वर्ग यह भी कहता है कि अंतरिम सरकार से किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि उसका काम सिर्फ चुनाव तक देश को संभालना है।

अब सबसे अहम है आने वाला चुनाव। क्या यह समय पर होगा? क्या यह पारदर्शी और निष्पक्ष होगा? यही सवाल नेपाल के भविष्य को तय करेंगे।

सुशीला कार्की ने भी साफ कहा है कि उनकी प्राथमिकता सिर्फ यही है— “देश को शांत रखना और निष्पक्ष चुनाव कराना।” उन्होंने यह भी ऐलान किया कि वे खुद चुनाव नहीं लड़ेंगी।

नेपाल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। पहली बार किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाना सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि समाज में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का संकेत भी है। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस छोटे से पहाड़ी देश पर टिकी हैं, जो अपने लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

भारत समेत तमाम पड़ोसी देशों की यही उम्मीद है कि नेपाल इस बार अस्थिरता से बाहर निकलकर शांति और विकास की राह पर आगे बढ़ेगा।

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