नई दिल्ली। भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था इन दिनों दो बड़े बदलावों के केंद्र में है। पहला है GST 2.0 सुधार, जिसे सरकार ने टैक्स प्रणाली को सरल और जनता के अनुकूल बनाने के लिए पेश किया है। दूसरा है अमेरिकी टैरिफ, जिसने भारतीय निर्यात क्षेत्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। ये दोनों घटनाएँ मिलकर न केवल भारत की आर्थिक रणनीति बल्कि इसकी राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकती हैं।
GST 2.0 सुधार: जनता के लिए क्या बदलेगा?
सरकार ने लंबे समय से चल रही शिकायतों को ध्यान में रखते हुए GST संरचना में बड़ा बदलाव किया है। अब केवल दो प्रमुख स्लैब होंगे — 5% और 18%। आवश्यक वस्तुओं जैसे खाद्यान्न, दवाएँ और दैनिक उपयोग की चीज़ों पर 5% टैक्स रहेगा, जबकि अन्य अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं पर 18% की दर लागू होगी। इसके अलावा लग्ज़री और सिन प्रोडक्ट्स पर 40% टैक्स लगाया जाएगा।
सबसे अहम बदलाव है हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पर टैक्स हटाना। यह कदम मध्यम वर्ग और शहरी परिवारों के लिए राहत की तरह है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि इससे लोगों में बीमा योजनाएँ लेने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और दीर्घकाल में सामाजिक सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।केंद्र सरकार का दावा है कि सरल टैक्स ढांचा निवेशकों के लिए माहौल को अनुकूल बनाएगा। इससे कर चोरी कम होगी और व्यापारियों का अनुपालन आसान होगा। सरकार यह भी मानती है कि घरेलू खपत बढ़ने से आर्थिक विकास दर को सहारा मिलेगा।
विपक्षी दलों ने इस सुधार को “आधी-अधूरी योजना” बताया है। उनका कहना है कि राज्यों की राजस्व आय प्रभावित होगी और केंद्र पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। कई अर्थशास्त्री भी यह मानते हैं कि सुधार के वास्तविक नतीजे सामने आने में 1 से 2 साल का समय लगेगा। यदि राजस्व घटता है तो सरकार को या तो उधारी लेनी होगी या फिर खर्चों में कटौती करनी होगी।
अमेरिकी टैरिफ की चुनौती
दूसरी तरफ अमेरिका ने हाल ही में भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। इसमें खासकर स्टील, कपड़ा और आईटी उत्पाद शामिल हैं। यह कदम भारत के लिए चिंता का कारण है क्योंकि अमेरिका भारतीय निर्यात का एक बड़ा गंतव्य है।
राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव का संकेत देता है। विपक्ष इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की नाकामी बता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा और नए व्यापार समझौतों के जरिए समाधान खोजेगा।
राजनीति पर प्रभाव
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो दोनों घटनाएँ चुनावी समीकरणों को बदल सकती हैं। बीजेपी GST सुधार को जनता के बीच आर्थिक राहत और सुशासन के प्रतीक के रूप में पेश करेगी। हेल्थ इंश्योरेंस पर टैक्स हटाने को “जनहितकारी कदम” बताया जाएगा। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे “राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर हमला” कहकर जनता को आकर्षित करने की कोशिश करेंगे।अमेरिकी टैरिफ पर भी विपक्ष सरकार को घेरने से पीछे नहीं हटेगा। यदि निर्यात क्षेत्र प्रभावित हुआ और रोज़गार के अवसर घटे तो यह मुद्दा चुनावी राजनीति का अहम हथियार बन सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है। लेकिन अमेरिकी टैरिफ से निर्यात क्षेत्र पर दबाव बढ़ेगा। सवाल यह है कि क्या GST 2.0 से उत्पन्न घरेलू मांग इस नुकसान की भरपाई कर पाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग ज्यादा खर्च करेंगे और निवेशक नए कारोबार में पैसा लगाएंगे तो भारत इस चुनौती को पार कर सकता है। लेकिन अगर टैरिफ के कारण उद्योगों को झटका लगा और रोजगार घटे तो अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर होगा।
- जरूरी सामान सस्ते होने की संभावना है।
- इंश्योरेंस पर टैक्स हटने से मध्यम वर्ग को राहत मिलेगी।
- पर यदि टैरिफ से नौकरियों पर असर पड़ा तो जनता को इसका नकारात्मक असर भी झेलना पड़ सकता है।
यह साफ है कि भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था एक दोहरी चुनौती के दौर से गुजर रही है। एक तरफ GST 2.0 से जनता को राहत और सरकार को राजनीतिक लाभ मिल सकता है, दूसरी तरफ अमेरिकी टैरिफ से निर्यात और रोज़गार पर संकट खड़ा हो सकता है।
अगले 6 से 12 महीनों में यह तय होगा कि क्या घरेलू मांग अमेरिकी टैरिफ से हुए नुकसान की भरपाई कर पाती है या नहीं। नतीजतन, आने वाला वक्त ही बताएगा कि भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ती है।



