चुपचाप दायर हुई एक शिकायत… अब भारत के क्लीन एनर्जी मिशन पर सवाल! क्या चीन की चाल है कुछ बड़ा?

हाल ही मे चीन ने world trade organisation(WTO) मे भारत के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करवाई है, जिसमें उसने आरोप लगाया है कि भारत इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और बैटरियों को दिए जाने वाले सब्सिडी के जरिए घरेलू उद्योगों को अन्यों की तुलना में अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ दे रहा है।

यह कदम भारत और चीन के बीच व्यापार तनाव को एक नया मोड दे रहा है खासकर उस क्षेत्र मे जो भविष्य की हरित एवं स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों से जुड़ा है। इस लेख में हमें इस विवाद की पृष्ठभूमि, दोनों पक्षों की दलीलों एवं आगे क्या हो सकता है ,इस पर एक विस्तृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करेंगे।

Background : भारत की EV और battery policy
अगले दशक में ऊर्जा संक्रमण (energy transition) और जलवायु परिवर्तन के गोल को नजर में रखते हुए , भारत ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए कई पालिसी और इनकरेजमेंट पैकेज शुरू कर हैं ।

1. FAME (faster adoption and manufacturing of      hybrid & electric vehicles ) जैसे प्रोग्राम, जो ई- वाहनों पर सब्सिडी देते है।

2. न्यू स्कीम जैसे PM eDRIVE जो चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को प्रोत्साहित करती हैं, साथ ही इन्वेंटरी और चार्जिंग स्टेशन के लिए सपोर्ट करती है।

3. भारत सरकार की ओर से production Linked incentive (PLI) जैसे पैकेज, जिससे कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने पर लाभ मिलता है।

इन उपायों का उद्देश्य यह है कि भारत न सिर्फ ev उपायों को बढ़ाए बल्कि बैटरी उत्पादन, कच्चे माल के मूल्य की श्रृंखला (supply chain) or value addition को भी मजबूत करें।
चीन विश्व में EV और battery क्षेत्र मे एक प्रमुख ताकत है। बहुत सी बैटरी को कंपनिया , इलेक्ट्रोड निर्माण, कच्चे माल (rare Earth) संसाधन और अन्य चीजों की प्रभुसत्ता है। जब भारत ऐसी नीतियां अपनाता है तो घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देता है , तो चीन को यह चिंता होती है कि उसकी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा खराब हो सकती है।


चीन की दलोले : क्या आरोप है?
चीन की ओर से WTO मे दिए गए मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:

1. अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ 
चीन का कहना है कि भारत द्वारा दी गई सब्सिडी, कर से छूट और          अन्य सुविधाए भारत के घरेलू उद्योगों को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में एक आंकछिक लाभ देती है। ये उपाय बहुत व्यापक है,जिससे विदेशी निर्माता प्रभावित होते है।

2. WTO नियमों का उल्लंघन
चीन आरोप लगाता है कि ये उपाय “import substitution subsidies” की लिस्ट में आता है , और WTO की कई चीजों का उल्लंघन करते हैं। साथ ही, भारत पर “National treatment” के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप भी लगाया गया है।

3. भारतीय उपयोगों में चीनी उद्यमों को क्षति
चीन का तर्क है कि भारतीय सब्सिडी से चीनी कंपनियों को export में नुकसान हो सकता है , और वह भारत को कहता है कि वह अपनी पॉलिसी को सुधारे

4. सलाह – परामर्श की मांग
चीन ने WTO में भारत के परामर्श (consultations) की मांग की है -ये WTO विवाद निपटान प्रक्रिया का पहला कदम है। यदि दोनों पक्षों की बैठक से हल नहीं निकला , तो अगले चरण में एक न्यायाधिकार (panel) बनाया जा सकता है।

चीन ने यह भी कहा है कि यदि भारत उचित कदम नहीं उठाएगा तो वह “firm measures” ले सकता है , यानि अन्य व्यापार उपायों पर विचार कर सकता है।

भारत की प्रतिक्रिया और चुनौतियां


जहां चीन शिकायत दर्ज कर रहा है , वहीं भारत की ओर से भी प्रतिक्रिया और तैयारी प्रारंभ हो चुकी है।
1. भारत के वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा है कि चीन द्वारा प्रस्तुत की गई विस्तृत दलीलों को वाणिज्य मंत्रालय की समीक्षा करेगा।

2. यदि परामर्श से समाधान नहीं निकलता है तो, भारत को WTO pannel प्रक्रिया का सामना करना होगा।

हालांकि भारत के सामने कुछ चुनौतियां हैं:


1 WTO नियमों का संतुलन
भारत को यह दिखाना होगा कि उसकी नीतियां WTO के अनुमत दायरे में है – की सब्सिडी सामाजिक – आर्थिक या पर्यावरण कारणों से दी गई है, और यह trade distorting नहीं है।

2 दलील आधारित जवाब
चीन की दलीलों का तर्कशास्त्रात्मक सामना करना होगा – जैसे यह बताना कि घरेलू उद्योग को दी गई छूट सिर्फ सीमित अवधि की है, या विशिष्ट मानदंडों के अधीन है , और सभी कंपनियों को समान अवसर है।

3 न्यायाधिकरण सुनवाई
यदि मामला पैनल तक जाता है तब भारत को प्रमाण और डेटा प्रस्तुत करना होगा – जैसे कि सबसिडी का प्रभाव , लाभ हानि आंकड़े आदि।

संभावित परिणाम और आगे की दिशा
. यह WTO pannel निर्णय भारत के विरुद्ध हुआ, तो भारत को कुछ पॉलिसी में बदलाव करने पड़ सकते है – जैसे सब्सिडी स्तर समायोजन, प्रावधानों में संशोधन,या कुछ प्रोत्साहन समाप्त करना ।

. दूसरी ओर यदि भारत WTO नियमों के अंतर्गत अपने उपायों को बचा लेता है तो यह अन्य देशों को भी संदेश देगा कि डेवलपिंग कंट्री कैसे हरित तकनीक को बढ़ावा दे सकते है ।

. इस विवाद का न सिर्फ भारत चीन व्यापार संबंधों पर असर होगा बल्कि वैश्विक ev एवं बैटरी श्रृंखला पर भी असर पड़ सकता है – निवेश, ग्लोबल साझेदारी और व्यापार प्रवृत्तियां प्रभावित हो सकती है।

. भारत को यह देखा जाना चाहिए कि भविष्य मे किस तरह की prohsahan नीतियां डिज़ाइन करे जो WTO के दायरे मे सुरक्षा प्रदान करे

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