India की सुरक्षा पर CDS Anil Chauhan का बड़ा बयान: चीन सबसे बड़ा खतरा, पाकिस्तान का प्रॉक्सी युद्ध चुनौती

नई दिल्ली: भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण बयान सामने आया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने शुक्रवार, 5 सितंबर 2025 को गोरखपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में देश की सुरक्षा चुनौतियों पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि चीन के साथ लंबित सीमा विवाद भारत के लिए सबसे बड़ी और दीर्घकालिक चुनौती है, जबकि पाकिस्तान की ओर से चलाया जा रहा प्रॉक्सी युद्ध भी गंभीर खतरा है।

चीन: सबसे बड़ा और दीर्घकालिक खतरा

जनरल चौहान ने कहा कि चीन के साथ अनसुलझा सीमा विवाद भारत की सुरक्षा नीति के लिए सबसे गंभीर चुनौती है। उनका कहना है कि यह सिर्फ सैनिक मोर्चे का मामला नहीं है, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। चीन की सीमा पर लगातार सैन्य गतिविधियां और उसकी विस्तारवादी नीति भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक खतरा हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में चीन और भारत की सीमा पर हुई झड़पें और तनावपूर्ण घटनाओं ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। भारत ने सीमा सुरक्षा के लिए कई आधुनिक तकनीकी उपाय किए हैं, लेकिन चीन की बढ़ती सैन्य ताकत इसे चुनौतीपूर्ण बनाती है।

पाकिस्तान और प्रॉक्सी युद्ध: सतर्कता की जरूरत

सीडीएस ने पाकिस्तान को भी एक गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान द्वारा समर्थित प्रॉक्सी युद्ध, यानी अप्रत्यक्ष संघर्ष, भारत की आंतरिक सुरक्षा और सीमा सुरक्षा दोनों के लिए खतरा है। उनका कहना था कि पाकिस्तान की यह रणनीति भारत को छोटे-छोटे संघर्षों के माध्यम से कमजोर करने की कोशिश करती है।

जनरल चौहान ने स्पष्ट किया कि यह केवल सीमा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। कश्मीर और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अस्थिरता पैदा करने के लिए भी पाकिस्तान यह रणनीति अपनाता है। ऐसे हालात में भारत को सैन्य तैयारी, खुफिया निगरानी, साइबर सुरक्षा और रणनीतिक नियंत्रण में सतर्क रहना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह प्रॉक्सी युद्ध नीति लंबे समय तक भारत की आंतरिक सुरक्षा पर दबाव बनाए रख सकती है। इसलिए, केवल सैन्य तैयारियां ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक उपाय और रणनीतिक कदम भी जरूरी हैं।

परमाणु हथियार और नए युद्ध के स्वरूप

सीडीएस ने यह भी कहा कि भारत को दो परमाणु हथियारों से लैस देशों से खतरे का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति पारंपरिक युद्ध की रणनीति को बदल देती है। केवल भूमि, समुद्र और वायु पर तैयारी पर्याप्त नहीं है। आज के युद्ध में साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्र भी शामिल हैं।

भारत ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। रक्षा मंत्रालय ने उपग्रह निगरानी, साइबर सुरक्षा नेटवर्क और आधुनिक तकनीक को मजबूत करने की पहल की है। इसका उद्देश्य केवल पारंपरिक खतरों से निपटना नहीं है, बल्कि नए प्रकार के युद्धों के लिए तैयार रहना भी है।

जनरल चौहान ने कहा कि भारत के पड़ोसी देशों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ रही है। यह केवल सैनिक चुनौती नहीं है, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी भारत को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए उन्होंने जोर दिया कि भारत को समन्वित और सशक्त रणनीति अपनानी होगी। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और रक्षा मंत्रालय के बीच निरंतर सहयोग शामिल है। इस सहयोग से न केवल वर्तमान खतरों का सामना किया जा सकता है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयारी संभव है।

समग्र रणनीति की आवश्यकता

सीडीएस ने कहा कि भारत को बहुआयामी और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। इसमें सैन्य तैयारी, तकनीकी सशक्तिकरण, कूटनीति और साइबर सुरक्षा सभी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सरकार या सेना की जिम्मेदारी नहीं है; समाज के हर स्तर पर जागरूकता और सहयोग जरूरी है।

जनरल चौहान का यह बयान देशवासियों के लिए भी एक संदेश है कि हमें सतर्क और संगठित रहना होगा। नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि सेना और सरकार की।

भारत आज दो प्रमुख खतरों का सामना कर रहा है: चीन के साथ लंबित सीमा विवाद और पाकिस्तान द्वारा समर्थित प्रॉक्सी युद्ध। इसके अलावा, परमाणु हथियार, साइबर खतरे और अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियां इसे और जटिल बनाती हैं।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान के अनुसार, इन खतरों से निपटने के लिए भारत को समन्वित, बहुआयामी और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। इसमें सेना, कूटनीति, साइबर सुरक्षा और नागरिक सहयोग सभी का योगदान जरूरी है।

उनका बयान साफ संदेश देता है कि भारत को अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क, संगठित और लगातार प्रयासरत रहना होगा। यह न केवल सेना या सरकार की जिम्मेदारी है, बल्कि हर नागरिक के लिए भी जरूरी है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्व को समझे और सहयोग करे।

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